August 11, 2026
जब गणित में तेज़ दिमाग़ कंप्यूटर से डरने लगे
बिहार के विद्यार्थियों की तकनीकी शिक्षा की एक अनकही कहानी

By Rajshree
24 min read
प्रतिभा की कमी नहीं, तकनीकी सोच तक पहुँच की कमी है
लेखक: RAJश्री | Software Engineer & Full Stack Developer
जिस विद्यार्थी ने कठिन गणितीय समस्याओं से लड़ना सीखा हो, वह programming से क्यों डरने लगे? जिसने JEE जैसी कठिन परीक्षा में अपनी क्षमता सिद्ध की हो, वह computer के सामने स्वयं को कमजोर क्यों समझने लगे?
शायद समस्या उसकी बुद्धि में नहीं है। शायद समस्या उस रास्ते में है, जिस रास्ते से उसे technology तक पहुँचना था।
बिहार के बच्चे Coding से क्यों डरते हैं? समस्या बच्चों में नहीं, हमारी Computer Education में है.
किसी छोटे-से गाँव के एक घर में बैठा एक बच्चा।
संसाधन सीमित हैं, लेकिन सपने बड़े हैं।
वह पढ़ता है। लगातार पढ़ता है।
गणित के कठिन प्रश्नों को हल करता है, Physics के numerical problems से जूझता है, Chemistry के concepts को समझता और याद करता है। परिवार की उम्मीदें उसके साथ चलती हैं और उसके सामने एक सीधा-सा लक्ष्य रखा जाता है — अच्छे अंक लाना, प्रतियोगी परीक्षा निकालना और एक सुरक्षित एवं सम्मानजनक career बनाना।
वह मेहनत करता है।
कभी-कभी वही बच्चा JEE जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षा में भी अच्छा प्रदर्शन करता है। किसी अच्छे संस्थान में उसका admission होता है। उसे Computer Science Engineering मिलती है।
पर फिर कॉलेज शुरू होता है।
कुछ महीनों बाद उसके सामने एक ऐसी दुनिया खड़ी होती है, जिससे वह अचानक असहज होने लगता है।
if
else
for
while
array
pointer
function
recursion
algorithmif
else
for
while
array
pointer
function
recursion
algorithmProgramming.
और वह विद्यार्थी, जिसने वर्षों तक कठिन mathematical problems हल की हैं, computer screen के सामने बैठकर सोचने लगता है —
"मुझसे coding नहीं होगी।"
लेकिन क्या सचमुच समस्या उसकी बुद्धि में है?
क्या उसकी logical ability अचानक कम हो गई?
क्या Mathematics में अच्छा प्रदर्शन करने वाला विद्यार्थी programming के लिए स्वाभाविक रूप से अनुपयुक्त है?
शायद नहीं।
शायद हमें एक और सवाल पूछना चाहिए —
क्या हमने उसे programming के लिए कभी तैयार ही किया था?
और शायद यही प्रश्न केवल एक विद्यार्थी का नहीं है।
यह बिहार सहित देश के उन लाखों विद्यार्थियों का प्रश्न है, जिन्हें हमने वर्षों तक परीक्षाओं के लिए तैयार किया है, लेकिन क्या हमने उन्हें उस तकनीकी भविष्य के लिए भी तैयार किया है जिसे वे स्वयं बनाने वाले हैं?
Programming से पहले की समस्या
हमारे यहाँ "language" शब्द सुनते ही सामान्यतः हमारे मन में हिंदी, अंग्रेज़ी, संस्कृत, उर्दू, भोजपुरी, मैथिली जैसी भाषाएँ आती हैं।
क्योंकि विद्यालयी जीवन में language का अर्थ प्रायः मनुष्य से संवाद करने का माध्यम रहा है।
फिर कॉलेज में अचानक कोई कहता है —
"C एक programming language है।"
और एक ऐसे विद्यार्थी के मन में, जिसने पहले कभी programming से परिचय नहीं पाया, एक बिल्कुल स्वाभाविक प्रश्न उठ सकता है —
"Computer की भी कोई language होती है?"
सवाल छोटा है।
लेकिन इसके पीछे एक बड़ी शैक्षणिक कमी छिपी हो सकती है।
जिस विद्यार्थी को कभी यह समझने का अवसर ही नहीं मिला कि —
- computer instructions को कैसे समझता है,
- programming language क्या होती है,
- algorithm क्या है,
- flowchart क्यों बनाया जाता है,
- program और सामान्य भाषा में क्या अंतर है,
- computer को instructions किस प्रकार दिए जाते हैं,
उसके सामने जब पहली बार C programming की किताब खुलती है, तो उसे केवल syntax दिखाई देता है।
if (...)
{
...
}if (...)
{
...
}उसे यह दिखाई नहीं देता कि इसके पीछे असल विचार क्या है।
और यहीं एक महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है —
Programming syntax याद करने का नाम नहीं है। Programming किसी समस्या को इस तरह समझने का अभ्यास है कि उसे स्पष्ट, क्रमबद्ध और machine-executable instructions में बदला जा सके।
यह केवल बिहार की समस्या नहीं है
इस विषय पर चर्चा करते समय एक सावधानी आवश्यक है।
इसे केवल Bihar Board की समस्या कहना पूरी तस्वीर नहीं होगी।
देश के अनेक विद्यालयों में computer education मौजूद है। कई CBSE, ICSE और private schools में भी coding, computer applications या programming से विद्यार्थियों का परिचय कराया जाता है।
लेकिन प्रश्न केवल यह नहीं है कि —
"Computer subject syllabus में है या नहीं?"
असल प्रश्न है —
"क्या हर विद्यार्थी को technology के साथ meaningful और practical exposure मिल रहा है?"
और इसका उत्तर हर जगह एक जैसा नहीं है।
कहीं computer education कुछ परीक्षात्मक प्रश्नों तक सीमित रह जाती है।
कहीं किताब उपलब्ध है, लेकिन पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं।
कहीं computer laboratory है, लेकिन उसका नियमित उपयोग नहीं होता।
कहीं infrastructure है, लेकिन maintenance और practical learning का अभाव है।
कहीं programming syllabus में है, लेकिन उससे पहले programming के लिए आवश्यक logical thinking और computational thinking विकसित करने की कोई क्रमबद्ध प्रक्रिया नहीं है।
इसलिए समस्या केवल यह नहीं है कि —
"बच्चों को coding नहीं आती।"
असली समस्या यह है कि कई विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर ही नहीं मिलता कि —
Computer की तरह समस्या के बारे में सोचना कैसे शुरू किया जाता है।
Programming Language और Programming में अंतर
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
किसी programming language का syntax याद कर लेना programming नहीं है।
if
else
for
while
function
arrayif
else
for
while
function
arrayइन keywords को याद किया जा सकता है।
लेकिन programming तब शुरू होती है जब विद्यार्थी किसी समस्या को देखकर पूछता है —
"मैं इसे स्वयं, एक-एक कदम में कैसे हल करूँगा?"
मान लीजिए किसी मनुष्य से कहा जाए —
"100 तक गिनो।"
मनुष्य के लिए यह लगभग trivial instruction है।
लेकिन computer के लिए हमें अधिक स्पष्ट होना पड़ेगा।
कहाँ से शुरू करना है?
अगली संख्या कैसे प्राप्त होगी?
कब रुकना है?
क्या हर संख्या को output करना है?
Computer हमारी अधूरी बात को मनुष्य की तरह अपने अनुभव से पूरा नहीं करेगा।
हमें प्रक्रिया स्पष्ट करनी होगी।
यहीं से algorithmic thinking की शुरुआत होती है।
Start
↓
Set number = 1
↓
Print number
↓
Increase number by 1
↓
Is number ≤ 100?
↓
Yes ───────────→ Repeat
↓
No
↓
StopStart
↓
Set number = 1
↓
Print number
↓
Increase number by 1
↓
Is number ≤ 100?
↓
Yes ───────────→ Repeat
↓
No
↓
Stopध्यान दीजिए —
यहाँ programming language अभी आई ही नहीं।
पहले समस्या को समझा गया।
फिर उसे steps में बदला गया।
फिर उन steps को algorithm के रूप में व्यवस्थित किया गया।
उसके बाद उसे किसी programming language में लिखा जा सकता है।
यही क्रम महत्वपूर्ण है।
हमारे विद्यार्थियों की एक विडंबना
हमारे विद्यालयों और coaching culture में बहुत-से विद्यार्थी बेहद मेहनती होते हैं।
वे Physics के कठिन numericals हल करते हैं।
Mathematics की जटिल problems पर घंटों काम करते हैं।
Competitive examinations की तैयारी करते हैं।
उनमें धैर्य होता है।
उनमें analytical ability होती है।
उनमें कठिन समस्याओं से जूझने की क्षमता होती है।
फिर Computer Science के सामने वही विद्यार्थी क्यों असहज हो जाता है?
क्योंकि programming उससे एक ऐसी आदत माँगती है, जिसे विद्यालयी शिक्षा में हमेशा व्यवस्थित रूप से विकसित नहीं किया जाता —
अपने समाधान को बिल्कुल स्पष्ट steps में व्यक्त करना।
Mathematics में कई बार हम formula और calculation की दिशा में सीधे आगे बढ़ सकते हैं।
Programming में हमें खुद से पूछना पड़ता है —
"अगर computer को मेरे दिमाग़ की बात पता नहीं है, तो मैं उसे हर कदम कैसे समझाऊँ?"
यह एक अलग प्रकार का अनुशासन है।
Computer को सीखने के लिए केवल तेज़ दिमाग़ नहीं, अलग तरह की सोच चाहिए
Programming में कई बार हमें machine की सीमाओं को स्वीकार करके सोचना पड़ता है।
मनुष्य कह सकता है —
"इन numbers में सबसे बड़ा number निकाल दो।"
Computer को हमें बताना होगा —
- पहला number लो।
- उसे current maximum मानो।
- अगला number पढ़ो।
- तुलना करो।
- यदि नया number बड़ा है, तो maximum बदल दो।
- सभी numbers समाप्त होने तक प्रक्रिया दोहराओ।
- अंत में maximum को output करो।
यही computational thinking का एक सरल उदाहरण है।
इसमें कई मूलभूत विचार छिपे हैं —
- Decomposition
- Sequencing
- Conditions
- Repetition
- Comparison
- State
- Abstraction
और यही वे विचार हैं जिन पर आगे चलकर algorithms और programs खड़े होते हैं।
इसलिए शुरुआत में विद्यार्थी को केवल code लिखवाना पर्याप्त नहीं है।
कभी-कभी उसे बिना computer के सोचने देना अधिक महत्वपूर्ण है।
कागज़ पर समस्या लिखिए।
उसे छोटे हिस्सों में बाँटिए।
Flowchart बनाइए।
Pseudo-code लिखिए।
अपने solution को manually test कीजिए।
फिर code लिखिए।
Code अक्सर सोच का अंतिम रूप होता है, सोच की शुरुआत नहीं।
मेरा अपना अनुभव भी इसी कहानी का एक हिस्सा है
मैं इस बात को केवल बाहर से देखकर नहीं कह रहा हूँ।
जब मैं college के first year में था और C programming पढ़ाई जा रही थी, तब शुरुआत में मेरे लिए भी programming की दुनिया सहज नहीं थी।
समस्या यह नहीं थी कि मैं पढ़ना नहीं चाहता था।
समस्या यह थी कि मेरे सामने अचानक एक बिल्कुल नई तरह की सोच रख दी गई थी।
हमने स्कूल में languages पढ़ी थीं — हिंदी, अंग्रेज़ी और अन्य विषय।
लेकिन computer की language क्या होती है?
Programming language क्या है?
Language के इतने प्रकार क्यों हैं?
किसी language का level क्या होता है?
Computer को आखिर instruction किस प्रकार समझाई जाती है?
Flowchart क्यों बनाते हैं?
Algorithm की आवश्यकता क्यों है?
Logic को code में कैसे बदला जाता है?
ये प्रश्न जब एक साथ सामने आते हैं, तो विद्यार्थी को लगता है कि वह शायद इस विषय के लिए बना ही नहीं है।
लेकिन वास्तविकता अक्सर बिल्कुल अलग होती है।
कई बार विद्यार्थी कमजोर नहीं होता; उसकी foundation अचानक नए विषय के सामने खुल जाती है।
यही वह जगह है जहाँ हमारी शिक्षा व्यवस्था को विद्यार्थी के पहले अनुभव को समझने की आवश्यकता है।
Syntax से पहले Problem Solving
Programming education में एक सामान्य गलती तब होती है जब विद्यार्थी को बहुत जल्दी syntax की दुनिया में पहुँचा दिया जाता है।
उसे बताया जाता है —
if
else
for
while
int
float
array
functionif
else
for
while
int
float
array
functionलेकिन उससे पहले शायद यह नहीं पूछा जाता —
"तुम किसी समस्या को हल कैसे करते हो?"
एक programming language माध्यम है।
वह हमारी computational thinking को machine तक पहुँचाने का माध्यम है।
इसलिए एक शुरुआती विद्यार्थी को पहले यह सीखना चाहिए —
- समस्या को ठीक से समझना
- उसे छोटे हिस्सों में बाँटना
- pattern पहचानना
- input और output पहचानना
- conditions समझना
- repetition पहचानना
- steps निर्धारित करना
- algorithm लिखना
- अपने solution को test करना
- गलती को पहचानना और सुधारना
इसके बाद language आती है।
C हो, C++ हो, Python हो या JavaScript —
Language बदल सकती है; problem-solving की बुनियाद नहीं।
छठी कक्षा से Computer Education का अर्थ बदलना होगा
यदि हम चाहते हैं कि बच्चे भविष्य की technology को केवल consume न करें, बल्कि उसे समझें और बनाएं, तो computer education को शुरुआती कक्षाओं से ही एक अलग दृष्टिकोण से देखना होगा।
छठी कक्षा से बच्चों को programming language का expert बनाना लक्ष्य नहीं होना चाहिए।
लक्ष्य होना चाहिए —
Computational Thinking विकसित करना।
बच्चों को छोटे puzzles दिए जा सकते हैं।
Patterns खोजने के लिए कहा जा सकता है।
दैनिक जीवन की प्रक्रियाओं को steps में लिखवाया जा सकता है।
उन्हें flowcharts बनाने दिए जा सकते हैं।
बिना computer के algorithms लिखवाए जा सकते हैं।
फिर धीरे-धीरे visual programming और block-based programming की ओर ले जाया जा सकता है।
उसके बाद Python जैसी relatively accessible language से programming fundamentals introduce किए जा सकते हैं।
यदि छठी कक्षा में Python fundamentals का curriculum लाया जाता है, तो यह अपने आप में बुरा विचार नहीं है।
लेकिन केवल किताब बदल देने से परिणाम नहीं बदलेगा।
Content, teaching methodology और teacher quality — तीनों को साथ बदलना होगा।
क्रम होना चाहिए —
Logic → Problem Solving → Algorithm → Programming → Projects
न कि —
Syntax → याद करो → परीक्षा दो → भूल जाओ।
केवल किताब पहुँचा देना Computer Education नहीं है
यहीं से चर्चा curriculum से निकलकर व्यवस्था और infrastructure तक पहुँचती है।
यदि किसी विद्यालय में computer की किताब पहुँचा दी गई, तो क्या computer education वास्तव में पहुँच गई?
जरूरी नहीं।
यदि computer laboratory है लेकिन उसका नियमित उपयोग नहीं होता, तो वह laboratory कम और inventory ज्यादा है।
यदि योग्य Computer Science teacher उपलब्ध नहीं है और केवल syllabus पूरा करने के लिए किसी अन्य शिक्षक से computer पढ़वाया जा रहा है, तो समस्या और गहरी है।
और यदि शिक्षक हैं भी, लेकिन उन्हें modern programming, AI, digital tools और computational thinking के लिए नियमित training नहीं मिलती, तो नई technology भी पुराने teaching methods के भीतर फँस सकती है।
इसलिए आवश्यकता केवल hardware की नहीं है।
आवश्यकता है —
- functioning computer laboratories की
- योग्य Computer Science teachers की
- नियमित teacher training की
- reliable internet और digital infrastructure की
- age-appropriate curriculum की
- project-based learning की
- computational thinking की
- programming fundamentals की
- AI literacy की
- और सबसे बढ़कर practical exposure की
और यह सुविधा केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
बिहार के हर जिले, हर प्रखंड और अधिक से अधिक सरकारी विद्यालयों तक यह ecosystem पहुँचना चाहिए।
Computer Lab केवल कमरा नहीं, Learning Environment होना चाहिए
कई बार हम infrastructure को केवल भवन और उपकरणों की संख्या से मापते हैं।
लेकिन एक computer lab की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितने computers रखे हैं।
सवाल यह होना चाहिए —
- क्या बच्चे नियमित रूप से computers पर काम करते हैं?
- क्या हर विद्यार्थी को स्वयं प्रयोग करने का अवसर मिलता है?
- क्या teacher practical sessions कराते हैं?
- क्या बच्चे छोटे projects बनाते हैं?
- क्या उन्हें internet और digital safety सिखाई जाती है?
- क्या वे programming को केवल किताब में पढ़ते हैं या वास्तव में लिखते भी हैं?
- क्या laboratory का उपयोग पूरे वर्ष होता है?
एक functioning computer lab वह जगह होनी चाहिए जहाँ विद्यार्थी केवल computer देखता नहीं, बल्कि computer से कुछ बनाता है।
शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण infrastructure हैं
हम technology की बात करते समय अक्सर computers, internet, smart classrooms और AI labs की चर्चा करते हैं।
लेकिन एक सच्चाई नहीं भूलनी चाहिए —
सबसे महत्वपूर्ण infrastructure एक सक्षम शिक्षक है।
यदि किसी विद्यालय में 20 computers हैं लेकिन programming समझाने वाला शिक्षक नहीं है, तो उन computers की क्षमता सीमित हो जाती है।
इसके विपरीत, एक अच्छा शिक्षक सीमित resources में भी बच्चों के भीतर curiosity पैदा कर सकता है।
इसलिए बिहार में computer education को मजबूत करने के लिए योग्य Computer Science teachers की नियमित और पर्याप्त बहाली अत्यंत आवश्यक है।
और केवल नियुक्ति पर्याप्त नहीं है।
उन्हें लगातार upskill भी करना होगा।
Programming languages बदलेंगी।
AI tools बदलेंगे।
Technology बदलती रहेगी।
इसलिए teacher training भी एक बार की प्रक्रिया नहीं हो सकती।
Teacher training को continuous process बनाना होगा।
यह जिम्मेदारी केवल स्कूल तक सीमित नहीं है
School foundation देता है।
लेकिन technology ecosystem वहीं समाप्त नहीं होता।
विद्यार्थी आगे Polytechnic, Engineering College और अन्य technical institutions में जाता है।
इसलिए यदि हम वास्तव में बिहार में technical workforce तैयार करना चाहते हैं, तो polytechnic colleges और engineering colleges को भी मजबूत करना होगा।
Polytechnic institutions में —
- पर्याप्त और योग्य technical faculty हो,
- functioning labs हों,
- practical projects हों,
- industry-oriented curriculum हो,
- local companies और startups के साथ interaction हो।
इसी तरह engineering colleges में भी केवल degree पूरी करवा देना पर्याप्त नहीं है।
विद्यार्थियों को —
- industry exposure
- internships
- live projects
- coding communities
- hackathons
- technical workshops
- open-source contribution
- startup exposure
- professional mentorship
जैसी opportunities मिलनी चाहिए।
हर Engineering Student को Internship और Industry Exposure क्यों नहीं?
यहाँ बिहार के technical education ecosystem के सामने एक बड़ा प्रश्न है।
यदि किसी राज्य में बड़ी संख्या में engineering colleges हैं, तो क्या उन सभी विद्यार्थियों को industry exposure देने के लिए सरकार और institutions मिलकर कोई मजबूत framework नहीं बना सकते?
राज्य सरकार private IT companies, startups, technology firms और established industries के साथ सक्रिय रूप से संवाद कर सकती है।
Engineering students के लिए structured internship programs विकसित किए जा सकते हैं।
Industry professionals colleges में workshops ले सकते हैं।
Companies live projects दे सकती हैं।
Students को summer internships और apprenticeship opportunities से जोड़ा जा सकता है।
और यह केवल कुछ प्रतिष्ठित colleges तक सीमित नहीं होना चाहिए।
हर जिले के engineering और polytechnic students को industry से जुड़ने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।
क्योंकि classroom में software engineering पढ़ना और वास्तविक software engineering team में काम करना —
दो बिल्कुल अलग अनुभव हैं।
बिहार को केवल Degree Holders नहीं, Industry-Ready Engineers चाहिए
हमारे engineering colleges हर वर्ष हजारों graduates तैयार कर सकते हैं।
लेकिन degree और employability एक ही चीज़ नहीं हैं।
एक विद्यार्थी के पास B.Tech की degree हो सकती है, लेकिन उसे Git, GitHub, databases, APIs, cloud, testing, software architecture, communication, teamwork या professional development workflow का practical अनुभव न हो।
दूसरी ओर, एक विद्यार्थी जिसने college के दौरान real projects, internships और industry mentorship प्राप्त की हो, वह नौकरी के लिए कहीं बेहतर तैयार हो सकता है।
इसलिए technical education का लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए —
"कितने students graduate हुए?"
बल्कि यह भी होना चाहिए —
"कितने students वास्तव में industry-ready हुए?"
IT Parks: केवल उद्घाटन नहीं, उपयोग भी चाहिए
किसी राज्य में IT Park की घोषणा होना अच्छी बात है।
उसका निर्माण होना उससे भी अच्छी बात है।
उसका उद्घाटन होना आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकती है।
लेकिन वास्तविक सफलता वहाँ से शुरू होती है।
IT Park में IT industry कितनी आई?
कितने startups आए?
कितने लोगों को रोजगार मिला?
कितने local graduates को opportunities मिलीं?
कितनी companies ने colleges के साथ partnerships कीं?
कितने products बने?
कितने नए businesses वहाँ से निकले?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं, तो हमें केवल यह कहकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए कि —
"हमने IT Park बना दिया।"
IT Park केवल भवन नहीं होना चाहिए।
उसे economic engine बनना चाहिए।
बिहार में IT Companies क्यों आएँगी?
यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
कोई भी company केवल इसलिए किसी राज्य में नहीं आती कि वहाँ एक सुंदर IT Park बना हुआ है।
उसे चाहिए —
- skilled workforce
- reliable internet
- electricity
- physical infrastructure
- business-friendly environment
- talent pipeline
- universities और colleges
- industry partnerships
- startup ecosystem
- ease of doing business
- long-term policy stability
इसलिए IT Park को isolated project की तरह नहीं देखना चाहिए।
उसे पूरे technology ecosystem के केंद्र के रूप में विकसित करना चाहिए।
एक तरफ school से talent आए।
दूसरी तरफ polytechnic और engineering colleges उस talent को technical skills दें।
Industry internships और training उपलब्ध कराए।
Startups उसी ecosystem से talent hire करें।
IT companies operations स्थापित करें।
और सरकार infrastructure तथा policy support प्रदान करे।
तभी एक self-sustaining technology ecosystem बन सकता है।
बिहार को केवल बाहर जाने वाले Engineers नहीं, यहाँ अवसर भी चाहिए
यहाँ एक uncomfortable लेकिन जरूरी सवाल है।
हर वर्ष बिहार के बहुत-से युवा पढ़ाई और नौकरी के लिए दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं।
यह गलत नहीं है।
अवसर जहाँ हो, वहाँ जाना स्वाभाविक है।
लेकिन क्या एक राज्य का दीर्घकालिक लक्ष्य ऐसा ecosystem बनाना नहीं होना चाहिए जहाँ उसका युवा यदि चाहे, तो अपने राज्य में रहकर भी world-class technology career बना सके?
यदि बिहार में —
- अच्छी companies हों,
- अच्छे startups हों,
- IT parks functional हों,
- engineering colleges industry-linked हों,
- polytechnics मजबूत हों,
- और school से ही technology culture विकसित हो,
तो रोजगार का एक बड़ा हिस्सा राज्य के भीतर ही पैदा हो सकता है।
यही वास्तविक development है।
"बिहारी विद्यार्थी सिर्फ सरकारी नौकरी के पीछे भागते हैं" — यह धारणा भी बदलनी होगी
बिहार के विद्यार्थियों के बारे में एक आम धारणा सुनने को मिलती है —
"यहाँ के बच्चे सिर्फ सरकारी नौकरी करना चाहते हैं।"
यह धारणा पूरी तस्वीर नहीं बताती।
सरकारी नौकरी की इच्छा के पीछे सामाजिक और आर्थिक कारण भी हैं।
सरकारी नौकरी stability देती है।
परिवारों को security दिखाई देती है।
और जब private sector के पर्याप्त भरोसेमंद अवसर स्थानीय स्तर पर दिखाई ही न दें, तो विद्यार्थी स्वाभाविक रूप से available paths की ओर जाते हैं।
इसलिए केवल विद्यार्थियों की मानसिकता को दोष देना आसान है।
लेकिन बेहतर सवाल यह है —
क्या हमने उन्हें पर्याप्त alternative opportunities दिखाई हैं?
यदि किसी जिले के विद्यार्थी को school से ही coding का exposure मिले,
college में internship मिले,
local startup दिखाई दे,
IT company में काम करने वाला mentor मिले,
hackathon में भाग लेने का अवसर मिले,
और graduation के बाद उसी राज्य में technology job उपलब्ध हो —
तो उसके career imagination का दायरा अपने आप बदल जाएगा।
Mindset केवल भाषणों से नहीं बदलता। Opportunities mindset बदलती हैं।
Government हर व्यक्ति को नौकरी नहीं दे सकती — लेकिन Ecosystem बना सकती है
यह एक कठोर लेकिन वास्तविक तथ्य है।
कोई भी सरकार राज्य के हर युवा को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती।
और न ही दीर्घकालिक विकास का मॉडल केवल सरकारी नौकरियों पर आधारित हो सकता है।
सरकार की भूमिका केवल employer बनने की नहीं है।
सरकार की भूमिका ecosystem builder बनने की भी है।
सरकार —
- infrastructure बना सकती है,
- education system मजबूत कर सकती है,
- teachers नियुक्त कर सकती है,
- industry को invite कर सकती है,
- startups को support कर सकती है,
- policies बना सकती है,
- companies और institutions के बीच partnerships facilitate कर सकती है,
- और ऐसा environment बना सकती है जहाँ private sector रोजगार पैदा करे।
तभी रोजगार का दायरा बढ़ेगा।
School → College → Industry: यह पूरी Pipeline बनानी होगी
बिहार को isolated initiatives से आगे बढ़कर एक complete technology pipeline की आवश्यकता है।
School
↓
Computer Literacy
↓
Computational Thinking
↓
Programming Fundamentals
↓
Projects & Curiosity
↓
Polytechnic / Engineering College
↓
Advanced Technical Skills
↓
Internships + Industry Exposure
↓
Startups / IT Companies / Research
↓
Employment & Entrepreneurship
↓
Local Technology EcosystemSchool
↓
Computer Literacy
↓
Computational Thinking
↓
Programming Fundamentals
↓
Projects & Curiosity
↓
Polytechnic / Engineering College
↓
Advanced Technical Skills
↓
Internships + Industry Exposure
↓
Startups / IT Companies / Research
↓
Employment & Entrepreneurship
↓
Local Technology Ecosystemयह pipeline तभी काम करेगी जब इसका हर हिस्सा मजबूत हो।
यदि school कमजोर है, तो foundation कमजोर होगी।
यदि college industry से disconnected है, तो graduate employability कमजोर होगी।
यदि industry नहीं है, तो skilled talent बाहर जाएगा।
यदि startups नहीं हैं, तो innovation कम होगी।
और यदि local opportunities नहीं हैं, तो वही पुराना cycle दोहराया जाएगा —
पढ़ो → degree लो → बिहार से बाहर जाओ।
हमें इस cycle को बदलना होगा।
बिहार में Local Tech Culture क्यों जरूरी है?
Technology ecosystem केवल institutions से नहीं बनता।
एक culture भी चाहिए।
ऐसा culture जहाँ बच्चे technology को केवल exam subject न समझें।
जहाँ coding clubs हों।
जहाँ school students छोटे projects बनाएं।
जहाँ colleges में hackathons हों।
जहाँ developers meetups करें।
जहाँ startups students से interact करें।
जहाँ engineers अपने अनुभव साझा करें।
जहाँ GitHub और open source जैसे concepts सामान्य हों।
जहाँ किसी छोटे शहर का बच्चा यह सोच सके —
"मैं भी technology में कुछ बना सकता हूँ।"
कभी-कभी awareness ही पहला infrastructure होती है।
Exposure भी एक संसाधन है
हम अक्सर resources का अर्थ computer, internet या laboratory से लगाते हैं।
लेकिन technology education में एक और संसाधन उतना ही महत्वपूर्ण है —
Exposure.
जिस बच्चे ने कभी किसी software engineer को काम करते नहीं देखा, उसके लिए software engineering एक दूर की दुनिया हो सकती है।
जिसने कभी GitHub नहीं देखा, उसके लिए open source केवल एक शब्द है।
जिसने कभी किसी local hackathon में भाग नहीं लिया, उसके लिए "build something" एक abstract idea हो सकता है।
और जिस बच्चे ने कभी किसी engineer से यह नहीं सुना —
"मैं भी तुम्हारी तरह एक विद्यार्थी था।"
उसके लिए technology में अपना भविष्य देखना कठिन हो सकता है।
इसलिए exposure केवल सुविधा नहीं है।
Exposure aspiration बनाता है।
AI के युग में Fundamentals और भी महत्वपूर्ण हैं
आज Artificial Intelligence हमारे programming workflow को तेजी से बदल रही है।
AI tools code लिख सकते हैं।
Debugging में मदद कर सकते हैं।
Documentation बना सकते हैं।
Concepts समझा सकते हैं।
कभी-कभी पूरा function या application भी generate कर सकते हैं।
लेकिन इससे computer fundamentals की आवश्यकता कम नहीं होती।
शायद इसके विपरीत, वह और बढ़ जाती है।
क्यों?
क्योंकि यदि AI ने code लिखा और हमें यह पता ही नहीं कि code क्या कर रहा है, तो हम केवल output पर निर्भर हैं।
लेकिन जिस विद्यार्थी को fundamentals आते हैं, वह AI को tool की तरह इस्तेमाल कर सकता है।
वह पूछ सकता है —
- यह approach क्यों काम कर रही है?
- इसकी complexity क्या है?
- इसमें security problem कहाँ हो सकती है?
- क्या इससे बेहतर architecture संभव है?
- AI ने जो code दिया है, उसमें bug कहाँ है?
यही अंतर है —
AI से code लेना और AI के साथ engineering करना।
इसलिए AI literacy के साथ computer fundamentals को मजबूत करना जरूरी है।
विद्यार्थियों से भी एक आग्रह
लेकिन सारी जिम्मेदारी व्यवस्था की नहीं है।
विद्यार्थियों को भी अपने डर को पहचानना होगा।
यदि आपने PCM पढ़ा है, कठिन Mathematics की है, competitive examination की तैयारी की है, तो programming से डरना आपकी क्षमता का प्रमाण नहीं है।
Programming नहीं आती?
कोई समस्या नहीं।
Programming नहीं आती, इसलिए programming सीखने से डरते हैं?
यहीं समस्या शुरू होती है।
शुरुआत बहुत छोटी रखिए।
यह मत सोचिए —
"मुझे software engineer बनना है।"
पहले पूछिए —
"क्या मैं किसी समस्या को step-by-step सोच सकता हूँ?"
एक कागज़ लीजिए।
एक समस्या लिखिए।
उसे manually हल कीजिए।
उसके steps लिखिए।
Flowchart बनाइए।
Pseudo-code लिखिए।
फिर code में बदलने की कोशिश कीजिए।
Error आएगा।
Program नहीं चलेगा।
Logic गलत होगा।
फिर उसे ठीक कीजिए।
यही programming है।
पहला सफल program महत्वपूर्ण है।
लेकिन पहला meaningful error उससे भी अधिक शिक्षाप्रद हो सकता है।
Coding का डर अक्सर Coding का डर नहीं होता
विद्यार्थी अक्सर कहते हैं —
"मुझसे coding नहीं होगी।"
लेकिन कई बार वास्तविक समस्या coding नहीं होती।
समस्या होती है —
"मुझे समझ नहीं आ रहा कि समस्या को सोचना कहाँ से शुरू करूँ।"
और यह क्षमता जन्मजात नहीं है।
इसे विकसित किया जा सकता है।
जिस तरह Mathematics में लगातार problems solve करने से mathematical maturity आती है, उसी तरह programming में लगातार problems को छोटे हिस्सों में बाँटने से computational maturity विकसित होती है।
इसलिए शुरुआत में code कम लिखिए।
Problems ज्यादा सोचिए।
पहले algorithm लिखिए।
फिर code लिखिए।
सरकार से कुछ स्पष्ट अपेक्षाएँ
यदि बिहार को वास्तव में technology-driven economy की ओर ले जाना है, तो कुछ बातें केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
1. हर विद्यालय में Computer Education का वास्तविक ecosystem
केवल computer subject नहीं, बल्कि practical computer education।
2. योग्य Computer Science teachers की पर्याप्त बहाली
Computer education को दूसरे विषय के अतिरिक्त दायित्व की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
3. Functioning Computer Labs
Lab केवल स्थापित न हों — उनका नियमित उपयोग, maintenance और monitoring भी हो।
4. Computational Thinking को शुरुआती कक्षाओं से बढ़ावा
Programming language से पहले problem-solving और logical thinking।
5. Polytechnic Colleges को मजबूत करना
योग्य technical faculty, functioning labs और industry-oriented training।
6. Engineering Colleges को Industry से जोड़ना
Companies और colleges के बीच structured partnerships विकसित हों।
7. Students के लिए Internships और Training
हर engineering student को वास्तविक industry exposure का अवसर मिले।
8. District-Level Coding और Technology Ecosystem
Coding clubs, hackathons, workshops, innovation labs और mentorship programs।
9. IT Parks का वास्तविक उपयोग
IT Park का लक्ष्य केवल inauguration नहीं, बल्कि companies, startups और employment होना चाहिए।
10. IT Companies को बिहार में लाने की सक्रिय नीति
सरकार को technology companies के साथ लगातार संवाद कर उन्हें बिहार में operations स्थापित करने के लिए आकर्षित करना चाहिए।
11. Startup Ecosystem
Local founders के लिए incubation, mentorship, infrastructure और industry connections।
12. School से Industry तक एक स्पष्ट Pipeline
School
↓
Computer Education
↓
Computational Thinking
↓
Programming
↓
Projects
↓
Polytechnic / Engineering
↓
Internship
↓
Industry
↓
Startup / Employment / EntrepreneurshipSchool
↓
Computer Education
↓
Computational Thinking
↓
Programming
↓
Projects
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Polytechnic / Engineering
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Internship
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Industry
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Startup / Employment / Entrepreneurshipऔर सबसे महत्वपूर्ण —
हर initiative का मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि उससे जमीन पर क्या बदला, न कि केवल कितनी घोषणाएँ हुईं।
यह किसी बच्चे की कमजोरी की कहानी नहीं है
जब कोई विद्यार्थी JEE जैसी कठिन परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद Computer Science में संघर्ष करता है, तो हमें तुरंत यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि उसमें क्षमता नहीं है।
हो सकता है उसे केवल वह exposure कभी मिला ही न हो जिसकी उसे आवश्यकता थी।
हो सकता है उसने वर्षों तक problems के निर्धारित answers खोजे हों और पहली बार उससे कहा जा रहा हो —
"अब तुम स्वयं एक solution बनाओ।"
इन दोनों अनुभवों में बहुत अंतर है।
एक में विद्यार्थी answer तक पहुँचता है।
दूसरे में उसे answer तक पहुँचने की प्रक्रिया design करनी होती है।
और शायद यही वह अंतर है जिसे हमारी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर ढंग से समझने की आवश्यकता है।
बिहार के बच्चे को कम मत आँकिए
बिहार के विद्यार्थी को sympathy की आवश्यकता नहीं है।
उसे दया नहीं चाहिए।
उसे केवल अवसर चाहिए।
उसे exposure चाहिए।
उसे यह सुनने की आवश्यकता नहीं कि —
"तुम गाँव से हो, तुम्हारे पास resources नहीं हैं।"
उसे यह सुनने की आवश्यकता है —
"तुम्हारे पास क्षमता है। अब आओ, इसे सही दिशा में विकसित करते हैं।"
जिस विद्यार्थी ने सीमित संसाधनों में Mathematics और Physics की कठिन दुनिया को पार किया है, वह programming भी सीख सकता है।
जिस विद्यार्थी ने JEE जैसी परीक्षा की तैयारी की है, वह algorithms भी समझ सकता है।
जिस विद्यार्थी ने वर्षों तक कठिन problems से लड़ना सीखा है, वह software भी बना सकता है।
बस उसे programming language से पहले —
programming की सोच सिखानी होगी।
बिहार की तकनीकी प्रगति का असली पैमाना क्या होना चाहिए?
हम अक्सर पूछते हैं —
"बिहार से कितने IITians निकले?"
शायद हमें एक दिन यह भी पूछना चाहिए —
"बिहार से कितने technology products निकले?"
हम पूछते हैं —
"कितने विद्यार्थियों ने प्रतियोगी परीक्षा में कितने अंक प्राप्त किए?"
हमें यह भी पूछना होगा —
"उनमें से कितनों ने technology को समझकर कुछ बनाया?"
और शायद हमें यह भी पूछना चाहिए —
- कितनी technology companies ने बिहार में अपने offices खोले?
- कितने students को बिहार में ही internship मिली?
- कितने startups बिहार से बड़े हुए?
- कितने engineering graduates को अपने ही राज्य में technology jobs मिलीं?
- कितने students ने open source में योगदान दिया?
- कितने local problems के technology-based solutions बने?
यही वे प्रश्न हैं जो किसी राज्य के तकनीकी भविष्य की वास्तविक तस्वीर दिखा सकते हैं।
किसी IT Park की सफलता ribbon से नहीं, रोजगार से मापिए
एक IT Park का उद्घाटन एक घटना हो सकता है।
लेकिन उसका वास्तविक प्रभाव वर्षों में दिखाई देता है।
उसमें कितनी कंपनियाँ आईं?
कितने startups शुरू हुए?
कितने लोगों को रोजगार मिला?
कितने local graduates को opportunity मिली?
कितनी companies ने colleges के साथ partnerships की?
कितने products बने?
कितनी नई companies वहाँ से निकलीं?
अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो हमें केवल यह कहकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए —
"हमने IT Park बना दिया।"
Infrastructure तभी सफल है जब वह useful infrastructure बने।
और technology policy तभी सफल है जब वह technology activity और employment पैदा करे।
आज की चर्चा, कल का बिहार
शिक्षा पर चर्चा होना आवश्यक है।
लेकिन शिक्षा पर चर्चा केवल seminar halls, conferences और policy documents तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
उसका प्रभाव classroom तक पहुँचना चाहिए।
Computer lab तक पहुँचना चाहिए।
Teacher recruitment तक पहुँचना चाहिए।
Polytechnic तक पहुँचना चाहिए।
Engineering college तक पहुँचना चाहिए।
Internship तक पहुँचना चाहिए।
Industry तक पहुँचना चाहिए।
और अंततः —
विद्यार्थी के career तक पहुँचना चाहिए।
क्योंकि किसी शिक्षा नीति की सबसे बड़ी सफलता उसका document नहीं है।
उसकी सबसे बड़ी सफलता वह विद्यार्थी है जिसकी दिशा बदल गई।
बिहार को केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, अवसर बनाने वाले युवा चाहिए
यह बात किसी सरकारी नौकरी के विरोध में नहीं है।
सरकारी सेवा का अपना महत्व है।
लेकिन किसी भी राज्य का भविष्य केवल सरकारी नौकरियों से सुरक्षित नहीं किया जा सकता।
हमें ऐसे युवा भी चाहिए जो —
- software products बनाएँ,
- startups शुरू करें,
- technology companies बनाएँ,
- research करें,
- freelancing और global digital work करें,
- open source में योगदान दें,
- local समस्याओं के technology-based solutions बनाएँ,
- और दूसरे युवाओं के लिए रोजगार पैदा करें।
एक युवा को नौकरी मिलना अच्छी बात है।
लेकिन एक युवा यदि दस और युवाओं के लिए रोजगार का अवसर पैदा करे —
तो उसका प्रभाव कई गुना बड़ा हो जाता है।
अंत में एक सवाल
हम अक्सर पूछते हैं —
"बिहार से कितने IITians निकले?"
शायद हमें एक दिन यह भी पूछना चाहिए —
"बिहार से कितने technology products निकले?"
हम पूछते हैं —
"कितने विद्यार्थियों ने प्रतियोगी परीक्षा में कितने अंक प्राप्त किए?"
हमें यह भी पूछना होगा —
"उनमें से कितनों ने technology को समझकर कुछ बनाया?"
क्योंकि किसी राज्य की वास्तविक तकनीकी प्रगति केवल उसके विद्यार्थियों के ranks से नहीं मापी जाती।
वह इस बात से भी मापी जाती है कि उसके बच्चे —
क्या सोचते हैं, क्या बनाते हैं और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए technology का कितना उपयोग करते हैं।
और इससे भी आगे —
क्या उस राज्य ने अपने बच्चों के लिए ऐसा environment बनाया है जिसमें वे ये सब कर सकें?
बिहार के पास प्रतिभा पहले से है
बिहार के पास प्रतिभा है।
बिहार के पास मेहनती विद्यार्थी हैं।
बिहार के पास कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने वाली एक पूरी पीढ़ी है।
बिहार के पास ऐसे बच्चे हैं जो सीमित संसाधनों के बावजूद national-level competitive examinations में अपनी जगह बना सकते हैं।
कमी यदि कहीं है, तो हमें उसे केवल विद्यार्थी की क्षमता में नहीं खोजना चाहिए।
हमें यह भी देखना होगा कि —
क्या उस प्रतिभा को technology तक पहुँचने का सही रास्ता मिला?
क्या उसे सही समय पर exposure मिला?
क्या उसे सही teacher मिला?
क्या उसे practical environment मिला?
क्या उसे industry दिखाई दी?
क्या उसे यह विश्वास मिला कि वह technology में भी कुछ बना सकता है?
अब आवश्यकता है कि व्यवस्था उस प्रतिभा के आगे आने का रास्ता बनाए।
विद्यालयों में computer को केवल एक विषय की तरह नहीं, भविष्य को समझने के माध्यम की तरह पढ़ाया जाए।
Polytechnic और engineering colleges को industry से जोड़ा जाए।
Students को internships और practical exposure मिले।
IT parks को वास्तविक companies और startups से भरा जाए।
सरकार IT industries के साथ सक्रिय partnerships बनाए।
और बिहार के हर जिले में धीरे-धीरे ऐसा ecosystem विकसित हो जहाँ technology केवल पढ़ाई न जाए —
technology पर काम भी किया जाए।
क्योंकि अंततः हमें ऐसा बिहार चाहिए जहाँ किसी विद्यार्थी के सामने career के केवल दो विकल्प न हों —
"सरकारी नौकरी या बिहार से बाहर।"
बल्कि उसके सामने तीसरा विकल्प भी हो —
"यहीं रहकर कुछ बनाना।"
शायद असली शुरुआत वहीं होगी…
जिस दिन बिहार के किसी छोटे-से गाँव का कोई बच्चा पहली बार computer खोलकर यह नहीं पूछेगा —
"इसमें मुझे क्या पढ़ना है?"
बल्कि पूछेगा —
"मैं इससे क्या बना सकता हूँ?"
जिस दिन किसी सरकारी विद्यालय की computer lab केवल inspection के लिए नहीं, बल्कि हर सप्ताह बच्चों की आवाज़, experiments और छोटे-छोटे projects से भरी होगी।
जिस दिन किसी polytechnic का विद्यार्थी केवल diploma लेकर नहीं, बल्कि किसी वास्तविक project और industry experience के साथ निकलेगा।
जिस दिन किसी engineering student को internship पाने के लिए राज्य से बाहर जाने की मजबूरी नहीं होगी।
जिस दिन किसी IT Park का सबसे बड़ा achievement उसका inauguration नहीं, बल्कि वहाँ काम करने वाली companies और वहाँ से मिलने वाले रोजगार होंगे।
और जिस दिन बिहार का कोई युवा यह कह सकेगा —
"मैं technology में career बनाना चाहता हूँ, और इसके लिए मुझे अपना राज्य छोड़ना ही पड़े — यह जरूरी नहीं है।"
उस दिन हम केवल computer education की बात नहीं कर रहे होंगे।
हम एक वास्तविक technology ecosystem बना चुके होंगे।
एक अंतिम आग्रह
आज जब शिक्षा को लेकर बिहार में नीतिगत स्तर पर चिंतन और चर्चा हो रही है, तो शायद हमें computer education को भी केवल syllabus के एक chapter के रूप में नहीं, बल्कि राज्य के अगले 10–20 वर्षों के economic और technological future के हिस्से के रूप में देखना चाहिए।
क्योंकि आज जिस बच्चे को हम एक computer देंगे, वह कल केवल एक programmer नहीं बनेगा।
वह engineer हो सकता है।
वह researcher हो सकता है।
वह entrepreneur हो सकता है।
वह startup बना सकता है।
वह किसी global technology company में काम कर सकता है।
और शायद —
वह बिहार में ही अगली technology company खड़ी कर सकता है।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि —
"बच्चे को computer पढ़ाया गया या नहीं?"
सवाल यह होना चाहिए —
"क्या हमने उसे technology समझने, technology बनाने और technology के माध्यम से अपना भविष्य बनाने का अवसर दिया?"
बिहार के पास प्रतिभा पहले से है।
अब बारी है —
उस प्रतिभा के लिए ecosystem बनाने की।
क्योंकि किसी बच्चे की प्रतिभा केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसके पास कितना संसाधन है।
असली प्रश्न यह है कि —
क्या उसकी प्रतिभा को दिशा देने वाला अवसर उसके दरवाज़े तक पहुँचा?
हमें बिहार के बच्चों को केवल परीक्षाओं के लिए तैयार नहीं करना है।
हमें उन्हें उस भविष्य के लिए तैयार करना है, जिसे वे स्वयं बनाएँगे।
और उस भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी केवल विद्यार्थी की नहीं —
शिक्षक, परिवार, विद्यालय, महाविद्यालय, उद्योग और सरकार — सभी की है।
क्योंकि शायद बिहार की अगली बड़ी उपलब्धि कोई परीक्षा का Rank नहीं होगी।
शायद वह कोई ऐसा Product होगा,
जो किसी छोटे शहर के किसी युवा ने बनाया होगा।
कोई ऐसा Startup होगा,
जिसकी शुरुआत किसी साधारण-से कॉलेज के किसी विद्यार्थी ने की होगी।
कोई ऐसा Technology Solution होगा,
जो बिहार की किसी वास्तविक समस्या को हल करेगा।
और शायद —
वह कोई ऐसा बच्चा होगा,
जो आज किसी छोटे-से गाँव में बैठकर पहली बार computer की screen देख रहा है और सोच रहा है —
"मैं इससे क्या बना सकता हूँ?"
उस प्रश्न को जन्म देना ही शायद हमारी सबसे बड़ी शैक्षणिक जिम्मेदारी है।
और उस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उसे अवसर देना —
हम सबकी।
लेखक के बारे में
Rajश्री एक Software Engineer और Full Stack Developer हैं, जिन्हें आधुनिक web development, Artificial Intelligence, Machine Learning और practical software engineering में विशेष रुचि है।
वह MERN Stack के साथ real-world applications और digital products बनाने के साथ-साथ technology से जुड़े अपने अनुभव, विचार और सीख को लिखना पसंद करते हैं।
Shree Labs के माध्यम से वे software engineering, AI, technology, education और बिहार से जुड़े technology ecosystem जैसे विषयों पर अपने विचार साझा करते हैं।
🌐 Portfolio: https://rjshree.com 💼 LinkedIn: https://linkedin.com/in/rjshree 💻 GitHub: https://github.com/itsrjshree
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